प्रथम‌ नेपाली साहित्‍यक‌ ब्‍लग‌ पत्रीका‌ "सयपत्री"को ‌लागी‌ रचना ‌एवं सल्‍लाह‌ सुझाब‌ प्रतिक्रिया भए ‌यहां‌ क्‍लिक गरेर‌ मेल‌ पठाउनु‌ होला-

03 September 2005

हिन्‍दी ‌गजल

--- ग़ज़ल--- ज़लालत है ज़िदगी क्या छोड़ देना चाहिए अब अंधी गली में कोई मोड़ देना चाहिए क्या मिला उस बुत पे घंटियाँ टुनटुनानसे मिथ्या संस्कारों को अब तोड़ देना चाहिए कब तक रहोगे किसी के रहमो-करम पेज़ेहाद का कोई नारियल फोड़ देना चाहिए क्यों नहीं हो सकतीं अपनी एक ही दीवारें खंडित आस्थाओं को अब जोड़ देना चाहिए बहुत शातिराना चालें हैं तेरी बेईमान रविकहता है कहीं तो कोई होड़ देना चाहिए रविरतलामी (भारत)

5 Comments:

At 27 December, 2005, Blogger Raviratlami said...

अपने ब्लॉग स्थल पर मेरी ग़ज़ल प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद!

 
At 28 December, 2005, Blogger अनूप भार्गव said...

रवि जी:

बहुत सुन्दर और तीखी गज़ल है । बधाई ..

अनूप

 
At 29 December, 2005, Blogger Laxmi N. Gupta said...

ravi jii,

bahut achchhii ghazal hai. badhaaii.

 
At 19 November, 2006, Anonymous Anonymous said...

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At 17 January, 2011, Anonymous SK said...

BEKAR HAI
SHIK KE AANA

 

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